बिहार में इस बार हो रहे लोकसभा चुनावों में एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है. विकास मुद्दा बन कर उभरा है और इससे जाति आधारित वोटिंग पैटर्न को आघात पहुंचा है.
प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों के नेता विकास को नारा बना रहे हैं. राजनीतिक समीक्षकों की राय में इस बदलाव का श्रेय एक हद तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जाता है.
मुख्यमंत्री जन सभाओं में खुलेआम कह रहे हैं, "अगर काम से खुश नहीं हैं तो मुझे अगले विधानसभा चुनाव में दूध में मक्खी की तरह फेक दीजिएगा."
जनता और नेता दोनों इसे स्वीकार करते हैं. समस्तीपुर में पान की दुकान चलाने वाले रघुनाथ कहते हैं, "हम लोग तो उसी को वोट देंगे जो काम करता है. अब वो बात नहीं रही. जात-पात के आधार पर वोट नहीं मिलने वाला."
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मुज़फ़्फ़रपुर के जोगनी गांव निवासी श्यामनंदन पासवान कहते हैं, "हम लोग अच्छी सड़क चाहते हैं, बिजली चाहते हैं. उम्मीदवार चाहे किसी दल का हो, वोट उसी को देंगे जो काम करेगा."
हालाँकि सभी लोग इससे सहमत नहीं हैं. बेतिया के गोपालकृष्ण कहते हैं, "अभी ये नारा तो ठीक लगता है लेकिन जब बटन दबाने की बारी आएगी तो जात-पात का असर फिर दिखेगा. हाँ इतना ज़रूर है कि ऐसी सोंच रखने वाले लोगों की संख्या घटी है. अब सभी जाति में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो विकास के नाम पर मतदान करेंगे और उनके लिए उम्मीदवार की जाति अहम नहीं है."
सामाजिक न्याय से विकास तक
बिहार के सामाजिक-आर्थिक मामलों के जानकार शैबाल दास गुप्ता कहते हैं, "विकास नया राजनीतिक एजेंडा बन कर उभरा है. 1991 के बाद सामाजिक न्याय के सियासी एजेंडे पर राजनीति आधारित रही. पिछले बीस साल से राजनीति की धुरी यही थी."
वो कहते हैं, "पटना और मुज़फ्फ़रपुर में लड़कियां बाहर निकलने से डरती थी, अब साइकल से स्कूल जाती हैं. इससे बड़ा बदलाव क्या होगा. ये सुविधा सबको मिल रही है. किसी जाति की हो. कहीं सड़क बन रही है, कहीं पुलिया बन रही है, हर तरफ़ विकास का काम हो रहा है."
कांग्रेस में शामिल हुए साधु यादव, लोक जनशक्ति पार्टी के रामचंद्र पासवान और प्रकाश झा, जनता दल युनाईटेड के वैशाली से प्रत्याशी मुन्ना शुक्ला, दरभंगा से राजद उम्मीदवार मोहम्मद फ़ातमी समेत लगभग सभी प्रत्याशी स्वीकार करते हैं कि चुनाव में मुख्य मुद्दा विकास का है.
हालाँकि राजद के टिकट पर वैशाली से लड़ रहे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं कि सिर्फ़ विकास के मुद्दे पर चुनाव जीतना मुश्किल है.
वो कहते हैं, "अगर ऐसा होता तो मेरे क्षेत्र में सारे वोट मुझे ही मिल जाते. कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. विकास मुद्दा ज़रूर है लेकिन बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है."
किस हद तक..
स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक सुरेंद्र किशोर कहते हैं, "विकास के साथ-साथ शासकीय व्यवस्था में जनता का विश्वास भी बड़ा मुद्दा है. अपहरण, हत्या में आई कमी और कुल मिलाकर सुरक्षित होने का एहसास जनता की सोंच में भी बदलाव लाई."
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